Monday, 6 February 2017

‘खुला प्रेम पत्र’

मेरा खुला प्रेम पत्र तुम्हारे नाम--
प्रिय,

             जान, जानू, बाबू, बेटू, बेबी....जो तुम्हें अच्छा लगे वो समझ लेना...
          पता है क्या, जब तक मैं तुमसे नहीं मिला था तब तक लगता था पता नहीं वो कैसी होगी। फिर दिल को तसल्ली दिलाने के लिए खुद से बोलता कि वो जैसी सी होगी बस अच्छी सी होगी। पिछले डेढ़ साल जो तुमसे लड़ते झगड़ते निकाले वो जिंदगी के काफी अनुभवी और सबसे बेहतरीन झगड़े रहे हैं। कभी - कभी उन झगड़ों के बारे में सोचता तो मुझे ही लगता, कि कहीं मैंने ही ज्यादा बोल दिया है। ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है तुम भी कम नहीं हो। कुछ गलतियां तुम्हारी भी रहीं हैं। जैसे कि......तुम समझदार हो समझ सकती हो। वैसे आज खुश तो बहुत होगी तुम, क्योंकि जो तुम पिछले डेढ़ साल से सुनना चाहती थीं वो आज तुमने सुन ही लिया। पता नहीं क्यों तुमसे मिलकर जाने के बाद रहा ही नहीं गया। बिलकुल एकांत में बैठने के बाद भी दिल को सुकून ही नहीं मिला। सोचा आज तुमसे कह ही दूं। मेरा दिल भी हलका हो जाएगा। जैसे तैसे घबराते हुए कहा तब जाकर अच्छा महसूस कर रहा हूं। सपनों की दुनिया भी अजीब है यार। आप कब, क्या देख लें पता ही नहीं चलता है। खैर, ये बात तो थी सपनों की...।
तुम्हें पता है क्या एक लाइन जो मुझे अभी भी हसी दिला रही है। और वो ये है ‘यार ये जगह सही नहीं है’। शायद ये पढ़ने के बाद तुम्हें भी हसी आ ही जाएगी। एक बात और मैं किसी की ‘काउंसिलिंग’ नहीं करता। वो तो लोग मिलते हैं और बाते अपने आप निकलने लगती हैं। अब मेरी बातें तुम्हें ‘काउंसिलिंग’ लगने लगे तो बताओ मैं क्या कर सकता हूं। अंत में एक बात और ‘हां ये सच है कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं’ बस कभी बोलने की जरूरत नहीं समझी। और हां, मुझसे इसका जवाब नहीं चाहिए। क्योंकि मैं जानता हूं कि प्यार, मोहब्बत के लिए नहीं बना हूं। खैर कोई बात नही। अपना ख़याल रखा करो। हमेशा खुश रहो दिल से दुआ है ।



                                                                                                                                              तुम्हारा 'अंकित'

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