Sunday, 9 April 2017

क्या हम वाकई में खुश हैं, या खुश होने का दिखावा करते हैं....सोचने वाली बात है...???


         दिखावा... दिखावा और सिर्फ दिखावा... वर्तमान समय में लोगों ने दिखावे का चोला ओढ़ रखा है, खुशी उसके चेहरे पर झलकती तो है, लेकिन दिखाई नहीं देती है। सोचने वाली बात ये है, क्या वह वास्तव में खुश है। आप खुद अपने आप से पूछिए... दिनभर में कितनी परेशानियों का सामना करते हैं आप। कभी मां-बाप की सेहत की फिक्र तो कभी गर्लफ्रेंड से झगड़ा या फिर बच्चों की पढ़ाई की चिंता। फिर ऑफिस में बॉस की डांट-फटकार... फिर भी इंसान मुस्कराने का दिखावा करता रहता है। आज हर इंसान सिर्फ पैसे के पीछे भागता रहता है, पैसे को ही उसने खुशी मान लिया है। किसी के पास अच्छी बाइक हो या कार या किसी के बच्चों को अच्छा स्कूल जाता देख वो भी अपने परिवार के लिए ऐसे ही सपने संजोता है लेकिन इस प्रतियोगिता से भरी दुनिया में वह सुबह निकलता है और दिनभर की दौड़भाग के बाद जब कोई प्रतिफल नहीं निकलता और शाम को घर आता है तो फिर उसे अपने सपने बिखरते नजर आते है लेकिन अपने बच्चों के सामने उसे झूठी हंसी हंसनी ही पड़ती है। जाने कहां हमारी खुशी आज खो सी गई है, लेकिन पहले ऐसा नहीं था। इंसान का परिवार ही उसकी असली खुशी होती थी, दिनभर खेतों में काम के बाद जब वह घर आता था तो परिवार के साथ हंसी-ठिठौली, बच्चों का लाड़-प्यार, मां-बाप की सेवा में उसकी असली खुशी छिपी होती थी। आज तो सिर्फ दिखावा और चेहरे की झूठी हंसी को ही लोग खुशी समझ बैठते हैं। दुनिया बनने के बाद जबसे इंसान का विकास हुआ है, तब से वह दौड़ भाग में लगा है। अक्सर वह बनावटी चीजों के पीछे ही भागता आया है, और अभी भी मटीरियलस्टिक चीजों में ही अपनी खुशियां ढूंढ़ता है। जिसके चलते वह अपनी खुशियों के पैमानों को ही भूल गया है। इंसान ने जो काम करने की व्यवस्था बनाई है, उसने चीजों को और भी मुश्किल, और भी पेचीदा बना दिया है। पुरानी व्यवस्था के क्रम को अब वह धीरे-धीरे स्वीकार कर चुका है। उसका मानना है कि कुछ हासिल करने के बाद वो खुश हो जाएगा। लेकिन तब तक कुछ और आवश्यक जरूरते उसके सामने आ जाती हैं, और उसकी खुशियां धरी की धरी रह जाती हैं। इसी क्रम में कुछ भले लोगों को हैपीनेस इंडेक्स सूझा, लेकिन इसे जीडीपी और डेवलपमेंट के मुकाबले कम तरजीह मिलती है, और मिले भी क्यों न। जन्म लेने के बाद जब वह कुछ समझने योग्य होता है तबसे उसे यही सिखाया जाता है कि खुशी सिर्फ पैसे कमाने से मिलती है, एक अच्छी लाइफस्टाइल में रहने से वह खुश रह सकता है। फिर क्या, वह पैसे कमाने की होड़ में भागने लगता है।

          वैसे तो हिंदुस्तान अभी के समय में दुनिया में सबसे तेजी से विकसित होने वाला देश कहा जा रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि विकसित देश होने के बावजूद भी हम खुश नहीं हैं। हम खुश नहीं क्योंकि, हम अपनी खुशियां ब्रांडेड वस्तुओं में ढूंढ़ते हैं, फाइव स्टार होटल में खाना खाने में हम अपनी खुशिय़ां ढूंढ़ते हैं। लग्जरी कार से घूमने में हम अपनी खुशियां खोजते हैं। इतना ही नहीं चंद कागज के टुकड़े खर्च करने पर हमें लगता है कि हम खुश हैं। असल मायने में क्या है, खुशी कब मिलती है ये हमें पता ही नहीं है। और हम अपने खुश होने का दावा करते हैं।

         वर्ल्ड हैप्पिनेस 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक खुशी के मामले में पाकिस्तानी हम भारतीयों से कहीं आगे हैं। जी हां, संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड हैप्पिनेस रिपोर्ट 2017 कुछ यही कहती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि नार्वे दुनिया का सबसे खुश देश है। इसने तीन पायदान की छलांग लगाई है। पिछले साल नार्वे खुशहाल देशों की सूची में चौथे स्थान पर था। वहीं, डेनमार्क पहले स्थान पर था। इस सूची में 155 देशों को रखा गया है। इसमें चीन 79वें, पाकिस्तान 80वें और भारत 122वें नंबर पर है, जबकि पिछले वर्ष 118वें नंबर पर था। विकसित देश के दावा करना वाला देश खुशी के मायने में एक साल के भीतर 4 कदम पीछे हो गया है। सबसे ताज्जुब की बात तो यह है कि हमारे पड़ोसी देश जहां आए दिन हमले होते हैं। आए दिन दंगे फसाद की खबरें आती हैं। वो भी हमसे आगे हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक आतंकवाद के पनाहगाह पाकिस्तान और बेहद गरीब देश नेपाल जैसे देश भी खुशहाली के मामले में भारत से आगे हैं। दुनिया के देशों की खुशहाली का पता लगाने के लिए पैसों के साथ-साथ उस देश के लोगों की आय, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य, उदारता, सामाजिक स्तर और भ्रष्टाचार के स्तर को आधार बनाया गया।

       खुशहाल देश वो हैं जहां खुशहाली, सोसायटी में आपसी भरोसा, लोगों के बीच बराबरी और सरकार पर भरोसा ज्यादा है और इन सभी के बीच अच्छा बैलेंस है। इस सालाना रिपोर्ट का मकसद सरकारों और सिविल सोसायटी को खुशहाली के बेहतर तरीके बताना हैं। देशों के हैप्पीनेस इंडेक्स को वहां प्रति व्यक्ति जीडीपी, अच्छी लाइफ एक्सपेंटेंसी, फ्रीडम, सोशल सपोर्ट, उदारता और सरकार या बिजनेस में जीरो करप्शन के पैमाने पर आंका गया है। जबकि भारत में खुशी की कोई बात ही नहीं करता है।

इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल से अब तक चार पायदान नीचे खिसकने के बाद भी भारत सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। इसके बाद भी हम खुशी नहीं बल्कि विकास की ओर अग्रसर हैं, सिर्फ विकास की ही बातें करते हैं। घर परिवार में भी तरक्की की बात होती है। विकास की बात होती है। खुश कैसे रहा जाए,  खुशी कैसे मिलेगी इस बारे में कोई बात ही नहीं करना चाहता है। यदि यही हाल रहा तो आने वाले वर्ष में हम और नीचे खिसक सकते हैं। जोकि एक गंभीर चर्चा का विषय बन सकता है।

हैप्पिनेस रिपोर्ट 2017 की लिस्ट मे शामिल प्रमुख देश
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1 नॉर्वे
2 डेनमार्क
3 आईसलैंड
4 स्विट्जरलैंड
5 फिनलैंड
6 नीदरलैंड
7 कैनेडा
8 न्यूजीलैंड
9 ऑस्ट्रेलिया
10 स्वीडन
79 चीन
80 पाकिस्तान
97 भूटान
99 नेपाल
110 बांग्लादेश
120 श्रीलंका
122 भारत

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